पूर्वांचल की 'नकटी' परंपरा: आंगन की ओट में खिलखिलाती एक समांतर दुनिया

पूर्वांचल की 'नकटी' परंपरा: आंगन की ओट में खिलखिलाती एक समांतर दुनिया




नीलम श्रीवास्तव | सात फेरे ब्लॉग


तस्वीर की कल्पना कीजिए... आंगन जो कुछ देर पहले तक शहनाइयों और शोर-शराबे से गूंज रहा था, बारात के विदा होते ही वहां एक अजीब सी खामोशी पसर जाती है। घर के पुरुष और बाराती जा चुके होते हैं और पीछे रह जाती हैं सिर्फ घर की महिलाएं। लेकिन यही वो पल होता है जब एक दूसरी दुनिया का जन्म होता है। पूर्वांचल की मिट्टी से उपजी यह एक ऐसी परंपरा है जिसे हम 'नकटी' या 'नकौरा' के नाम से जानते हैं। यह महज एक मनोरंजन नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा महिलाओं का अपना एक समांतर सांस्कृतिक उत्सव है।


ऐतिहासिक रूप से देखें तो इस परंपरा की शुरुआत जरूरत और सुरक्षा के भाव से हुई थी। जब गांव के सभी पुरुष बारात में चले जाते, तो पीछे घर की सुरक्षा और रात भर जागने के लिए महिलाओं ने हंसी-मजाक का यह अनूठा रास्ता निकाला। लेकिन वक्त के साथ यह 'जागना' एक कलात्मक विद्रोह में बदल गया।


नकटी एक ऐसा प्रहसन है जहां वर्जनाओं की दीवारें ढह जाती हैं। इस बंद कमरे के थिएटर में पुरुष का प्रवेश वर्जित है, और शायद इसीलिए यहाँ की अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा आजाद है। यहाँ घर की ही कोई महिला काजल से मूंछें बनाकर 'दूल्हा' बनती है, कोई धोती लपेटकर 'पुरोहित' का स्वांग रचती है, तो कोई चुलबुली 'दुल्हन' बनकर महफिल लूट लेती है।


इस प्रहसन में विवाह के हर उस चरण को जिया जाता है जिसे महिलाएं अमूमन समाज की नजरों के डर से सिर्फ सहती आई हैं। यहाँ हंसी-ठिठोली के बीच उन सामाजिक बंदिशों और पितृसत्तात्मक व्यवहारों का बड़ी चतुराई से मजाक उड़ाया जाता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में उन पर थोपे जाते हैं। यह औरतों का वह 'सुरक्षित कोना' है, जहाँ वे अपनी दबी हुई अभिनय क्षमता, तीखा व्यंग्य और बेबाक हंसी को खुलकर जी पाती हैं।


'नकटी' सिर्फ नाच-गाना नहीं है; यह उन औरतों के बीच का एक अदृश्य और मजबूत रेशमी धागा है, जो उन्हें एक-दूसरे के दुखों और खुशियों से जोड़ता है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब समाज की पाबंदियां औरतों के बोलने पर पहरा लगाती हैं, तो वे अपनी भावनाओं के लिए लोक-कला का एक नया और खूबसूरत रास्ता बना लेती हैं। आज भी जब पूर्वांचल के किसी आंगन में रात के सन्नाटे को चीरती हुई औरतों के ठहाकों की आवाज आती है, तो समझ लीजिए कि 'नकटी' के जरिए कोई अपनी आज़ादी का उत्सव मना रहा है।

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