नीलम श्रीवास्तव | सात फेरे ब्लॉग
DJ की धुन और इंस्टाग्राम की चमक-दमक के शोर में, आजकल की शादियों के बीच, हम अक्सर उन रस्मों और परंपराओं के गहरे अर्थों को भूल जाते हैं जो कभी विवाह का आधार हुआ करती थीं। ये सिर्फ़ रीति-रिवाज़ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाले प्रतीक थे। लेकिन भारत के पूर्वांचल क्षेत्र में, आज भी कुछ ऐसी परंपराएँ जीवित हैं जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
गंगा और घाघरा के उपजाऊ मैदानों में बसे इस इलाके की विवाह परंपराओं में लोक-कला का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इन्हीं में से एक अनूठी कला है 'कोहबर'। यह सिर्फ़ एक दीवार पर की गई चित्रकारी नहीं, बल्कि एक पूरा दर्शन है जिसे विवाह के अवसर पर रचा जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि एक नवविवाहित जोड़े के कमरे की दीवारों पर बने साधारण से दिखने वाले चित्र अपने अंदर कितने रहस्य और जीवन के कितने सूत्र छिपाए हो सकते हैं?
यह सिर्फ़ चित्रकारी नहीं, एक 'लिखी' हुई नियमावली है
पूर्वांचल के भोजपुरी अंचल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कोहबर को 'बनाना' या 'पेंट करना' नहीं, बल्कि 'लिखना' कहा जाता है। यह एक शब्द इस कला को साधारण सजावट के स्तर से उठाकर एक पवित्र ग्रंथ, एक विधान का दर्जा देता है, जिसकी हर रेखा एक नियम और हर रंग एक सीख है। स्थानीय लोग इसे एक कलाकृति के बजाय एक प्रतीकात्मक लिपि या 'चित्रलिपि' के रूप में देखते हैं।
इस 'लिखावट' का उद्देश्य नवविवाहित जोड़े को गृहस्थ धर्म और जीवन दर्शन की शिक्षा देना है। यह एक तरह की सचित्र नियमावली है जो उन्हें बताती है कि एक सफल और सामंजस्यपूर्ण जीवन कैसे जिया जाए। स्वयं 'कोहबर' शब्द की उत्पत्ति 'कोष्ट-वर' से हुई है, जिसका अर्थ है वह कमरा जहाँ वर और वधू विवाह के बाद पहली बार मिलते हैं। और इस पवित्र 'लिखावट' की भाषा है प्रतीक।
हर प्रतीक एक गहरा दर्शन समेटे है
कोहबर में बनाया गया हर एक चिह्न और प्रतीक सोद्देश्य होता है; कुछ भी निरर्थक नहीं होता। हर आकृति के पीछे एक गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है, जो जोड़े को आशीर्वाद और मार्गदर्शन देता है।
• बाँस: कोहबर में बाँस प्रमुखता से बनाया जाता है क्योंकि यह पृथ्वी पर सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला पौधा है। यह इस कामना का प्रतीक है कि परिवार का वंश भी इसी गति से बढ़े और कुल की आयु लंबी हो।
• मछली का जोड़ा: मछली की प्रजनन क्षमता बहुत अधिक मानी जाती है, इसलिए मछलियों का जोड़ा उर्वरता और प्रेम का प्रतीक है।
• पक्षी: पक्षियों का चित्रण प्रेम और सहजीवन का संदेश देता है, यह सिखाता है कि रिश्ते को आपसी सहयोग से कैसे संवारा जाए।
• हाथी: हाथी को ऐश्वर्य, वैभव और जीवन में स्थिरता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता है।
• सूर्य और चंद्रमा: ये ब्रह्मांडीय शक्तियाँ हैं, जिन्हें इस कामना के साथ बनाया जाता है कि नवविवाहित जोड़े का जीवन हमेशा प्रकाश और ऊर्जा से भरा रहे।
यहाँ स्त्री और पुरुष बराबर हैं
पूर्वांचल की कोहबर कला की एक सबसे विशिष्ट और प्रगतिशील विशेषता है इसमें वर और वधू, दोनों के नाम का लिखा जाना। यह एक छोटी सी बात लग सकती है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है।
यह परंपरा लोक जीवन में स्त्री और पुरुष की बराबरी को रेखांकित करती है। एक ऐसे समय और समाज में जहाँ अक्सर पुरुषों को प्रधानता दी जाती थी, इस लोक कला का दोनों को समान दर्जा देना आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक और प्रभावशाली है। यह महज़ एक रिवाज़ नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का मौन विद्रोह और प्रगतिशील समाज का एक भूला हुआ घोषणापत्र है।
इस कला का मिटना भी एक उत्सव है
यह जानकर हैरानी होती है कि इतने पवित्र और गहरे अर्थों वाले इन चित्रों को स्थायी नहीं रखा जाता। लगभग सवा महीने के बाद, एक शुभ मुहूर्त देखकर इन चित्रों को मिटा दिया जाता है।
इस परंपरा के पीछे भी एक गहरा दर्शन छिपा है। इन चित्रों का मिटाया जाना जीवन की नश्वरता का प्रतीक है—कि कुछ भी स्थायी नहीं है। इस तरह, कोहबर की अंतिम सीख उसके मिट जाने में ही छिपी है: कि गृहस्थ जीवन का सच्चा सौंदर्य सृजन में है, न कि उसे पकड़कर रखने में। यह पुरानी चीज़ों को सम्मानपूर्वक विदा करके ही नए जीवन का स्वागत किया जा सकता है।
कला जो जीवन के साथ साँस लेती है
अंत में, कोहबर केवल एक लोक कला नहीं है; यह एक जीवंत परंपरा, एक मार्गदर्शक और एक संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि कैसे प्रकृति के प्रतीकों के माध्यम से जीवन के सबसे गहरे सबक दिए जा सकते हैं। यह कला हमें याद दिलाती है कि हमारी परंपराएँ सतही नहीं थीं, बल्कि उनमें ज्ञान का गहरा सागर छिपा था।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ, क्या हमारी आज की आधुनिक रस्मों में भी ऐसे ही गहरे अर्थ छिपे हैं, या फिर समय की धूल में हमने उन्हें पढ़ने की कला ही खो दी है?
